Sunday, 9 November 2008
Sunday, 5 October 2008
मानव की इच्छा
मानव हमेशा यह इच्छा रखता हे की में किसी के दुःख में काम आ सकू ।
किंतु आज इस सोच की कमी महसूस होती हे क्योकि मानव आज किसी से
भी ,विनम्रता से बात तो कर नही पता हे क्या उम्मीद की जा सकती हे की वह
किसी के काम आ सकेगा ।
आज मानव अपने में जो बदलाव महसूस करता हे उसके लिए आज का वातावरण दोषी
ही लगता हे।
प्रेम एक ऐसा शब्द हे की किसीको भी अपने प्रति समर्पित कर सकता हे यदि मानव मानव से प्यार से
नही रह सकता हे तो वह इश्वेर से क्या प्रेम रख सकेगा /इश्वेर के प्रति झूठी आस्था दिखाकर क्या साबित करना
चाहता हे .क्योंकि सभी मानव सिर्फ़ धन ,वैभव के लालच में पड़ा हे क्या अपनी नियमित जररूत के अतरिक्त
धन सिर्फ़ और सिर्फ़ मानव की झूठी शान बढाने वाला रह गया हे
किंतु आज इस सोच की कमी महसूस होती हे क्योकि मानव आज किसी से
भी ,विनम्रता से बात तो कर नही पता हे क्या उम्मीद की जा सकती हे की वह
किसी के काम आ सकेगा ।
आज मानव अपने में जो बदलाव महसूस करता हे उसके लिए आज का वातावरण दोषी
ही लगता हे।
प्रेम एक ऐसा शब्द हे की किसीको भी अपने प्रति समर्पित कर सकता हे यदि मानव मानव से प्यार से
नही रह सकता हे तो वह इश्वेर से क्या प्रेम रख सकेगा /इश्वेर के प्रति झूठी आस्था दिखाकर क्या साबित करना
चाहता हे .क्योंकि सभी मानव सिर्फ़ धन ,वैभव के लालच में पड़ा हे क्या अपनी नियमित जररूत के अतरिक्त
धन सिर्फ़ और सिर्फ़ मानव की झूठी शान बढाने वाला रह गया हे
Monday, 22 September 2008
Saturday, 20 September 2008
आतंकवाद
यह आतंकवाद इस दुनिया में क्या करना चाहता हे ?
क्या हिंदू क्या मुस्लमान कल इस्लामाबाद में जो हुआ वह
दरिंदगी की पराकाष्ठा नही हे.आतंकी का जब भी नाम आता हे तो वह मुस्लिम होता हे।
इस्लाम के इन पाक दिनों में क्या यह सब ठीक हे मेरे जानकारी में तो "रमजान"का महिना तो
सिर्फ़ खुदा की इबादत का हे ऐसा मेरे मुस्लिम दोस्त कहते हेई,क्या यह इबादत हे ,उन दरिंदो
के मन में क्या खुदा का डर नही .एक तरफ़ तो कहते हें की हम इस्लाम को बचाना चाहते हें
दिन पैर दिन न्यूज़ में दुनिया में किसी न किसी आतंकी घटना का जिक्र सुनने को मिलता हें
दुनिया में अमन चैन का कोई तो रास्ता होगा ।
क्या हिंदू क्या मुस्लमान कल इस्लामाबाद में जो हुआ वह
दरिंदगी की पराकाष्ठा नही हे.आतंकी का जब भी नाम आता हे तो वह मुस्लिम होता हे।
इस्लाम के इन पाक दिनों में क्या यह सब ठीक हे मेरे जानकारी में तो "रमजान"का महिना तो
सिर्फ़ खुदा की इबादत का हे ऐसा मेरे मुस्लिम दोस्त कहते हेई,क्या यह इबादत हे ,उन दरिंदो
के मन में क्या खुदा का डर नही .एक तरफ़ तो कहते हें की हम इस्लाम को बचाना चाहते हें
दिन पैर दिन न्यूज़ में दुनिया में किसी न किसी आतंकी घटना का जिक्र सुनने को मिलता हें
दुनिया में अमन चैन का कोई तो रास्ता होगा ।
Wednesday, 3 September 2008
Tuesday, 2 September 2008
जीवन का सफ़र
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